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| होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. प्रेम नारायण |
कलवारी (बस्ती) – दुधारू पशुओं में थनेला रोग या स्तनशोथ (Mastitis) एक आम लेकिन गंभीर समस्या के रूप में तेजी से फैल रही है, खासकर महिषवंशीय पशुओं में। यह रोग प्रारंभ में थन में गर्माहट, दर्द और सूजन के रूप में प्रकट होता है और यदि समय पर इलाज न मिले तो दूध की गुणवत्ता पर बुरा असर डालता है।
कलवारी के होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. प्रेम नारायण के अनुसार, थनेला रोग में पशु का शारीरिक तापमान बढ़ जाता है, दूध में छटका, खून या पीभ (पस) की मिलावट हो सकती है, और पशु खाना-पीना छोड़कर अरुचि से ग्रस्त हो जाता है। समय रहते पहचान और उपचार न होने पर यह समस्या गंभीर आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
डॉ. प्रेम नारायण का कहना है कि रोग की रोकथाम और शुरुआती इलाज में होम्योपैथिक दवाएं काफी कारगर साबित हो रही हैं। वे बताते हैं, "पशुपालक यदि प्रारंभिक चरण में ही 'फायटोलाइका डिकैंड्रा' और 'ब्रायोनिया अल्बा' जैसी दवाओं का प्रयोग करें, तो थनेला रोग की रोकथाम में अच्छी सफलता मिल सकती है।"
उन्होंने हालिया एक उदाहरण साझा करते हुए बताया कि एक पशुपालक की गाय गंभीर स्तनशोथ से पीड़ित थी, जिसमें सूजन, दूध दुहने में कठिनाई और खून आना शुरू हो गया था। होम्योपैथिक उपचार के बाद पशु की स्थिति में स्पष्ट सुधार देखा गया।
डॉ. प्रेम नारायण के अनुसार, कई बार ऐसे पशुपालक भी उनके पास आते हैं, जो एलोपैथिक इलाज से निराश हो चुके होते हैं। सही होम्योपैथिक चिकित्सा मिलने पर अधिकांश मामलों में सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।
पशु चिकित्सकों का मानना है कि समय पर पहचान, सही उपचार पद्धति और स्वच्छ दुग्ध प्रबंधन अपनाकर थनेला रोग से पशुओं को बचाया जा सकता है, जिससे पशुपालकों को दूध उत्पादन में नुकसान से भी राहत मिलती है।
