बाघोड़ा ग्राम पंचायत में असमानता की परतें उजागर, प्रतिनिधियों की चुप्पी ने बढ़ाया आक्रोश
बाघोड़ा ग्राम पंचायत का दृश्य आज यह संदेश देता है कि विकास के वादे अक्सर सिर्फ़ सत्तासीनों की जुबान तक ही सीमित रह जाते हैं। गांव में छह माह पूर्व आरम्भ हुआ नालियों का निर्माण कार्य अधूरा ही ठप पड़ा है। आश्चर्य की बात यह है कि आधे गांव की नालियां तो बना दी गईं, परंतु पिछड़े और कमजोर वर्ग की बस्ती को मानो जानबूझकर उपेक्षा के गर्त में धकेल दिया गया हो।
अधूरा निर्माण अब गांववालों के लिए अभिशाप साबित हो रहा है। सड़क पर ऊँचाई पर रखे अधपके ढक्कन हर दिन किसी बड़े हादसे की आहट सुनाते हैं। बच्चे गिरते हैं, बूढ़े ठोकर खाते हैं, महिलाएँ सहमी-सहमी गुजरती हैं। परंतु पंचायत और प्रशासन की नज़रें मानो इस हिस्से पर पड़ती ही नहीं। शिकायत करने की हिम्मत जुटाने वाले ग्रामीण डर के साये में जीते हैं, क्योंकि उन्हें भय है कि आवाज़ उठाने पर उनकी समस्याएँ और बढ़ा दी जाएँगी।
दलित बस्ती के निवासी अतुल का दर्द शब्दों में छलक आया – “हमारे हिस्से का विकास सिर्फ़ चुनावी रैलियों में सुनाई देता है। वोट मांगने के समय हमें गले लगाया जाता है, मगर चुनाव बीतते ही हम गुमनाम हो जाते हैं।” वहीं रंजीत का कहना है – “प्रधान ने हमारे रास्ते की नालियां अधूरी छोड़ दीं। हमारी बस्ती को हमेशा कमजोर समझकर हाशिए पर धकेला जाता है। यही हमारी सबसे बड़ी पीड़ा है।”
बाघोड़ा की यह स्थिति न केवल ग्राम पंचायत की विफलता को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि आज़ादी के दशकों बाद भी सामाजिक असमानता की दीवारें अब तक ज्यों की त्यों खड़ी हैं। सवाल यह है कि क्या विकास केवल ताकतवर तबके तक सीमित रहेगा और क्या कमजोर तबका हमेशा इसी उपेक्षा का शिकार होता रहेगा
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